Header logo

Wednesday, June 3, 2020

नए लिफाफों पुरानी घोषणाएं: सरकार घोषणाओं के जरिए किसानों को जो ‘नई’ राहतें दे रही है, उनमें ज्यादातर पुरानी हैं https://ift.tt/2XYalAD

खबरों में बताया जाता है, ‘किसानों के लिए सरकार की सौगात’। साथ में अक्सर प्रधानमंत्री की तस्वीर और बड़े-बड़े आंकड़े होते हैं। कुछ दूसरी खबरें गुम हो जाती हैं। ‘सात दिन से फसल खरीदी के इंतजार में मंडी में खड़े किसान’। ‘चना और मकई की खरीद ना होने पर किसानों को भारी धक्का’। ‘गन्ना किसानों को नहीं मिला पिछले सीजन का बकाया’। ‘ओलावृष्टि के शिकार किसानों ने मांगा मुआवजा’।

हम भ्रम पालते हैं कि सरकार कर तो बहुत कुछ रही है, लेकिन किसान तक पूरा फायदा पहुंच नहीं रहा। इन बड़ी सरकारी घोषणाओं की सच्चाई जानने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की नवीनतम घोषणा को लें। पिछले 3 साल से सरकार रबी व खरीफ की एमएसपी की घोषणा कुछ इस अंदाज में करती है मानो इतिहास में पहली बार किसान को एमएसपी दिया है। मूल्य में सालाना बढ़ोतरी ऐसे पेश होती है मानो पहले सालाना बढ़ोतरी नहीं होती थी। हर बार लागत का डेढ़ गुना दाम देने का दावा किया जाता है। सुनने वाले को लगता है कि किसान को बड़ा फायदा मिल गया है।
हकीकत यह है कि साल में दो बार एमएसपी की घोषणा की रस्म 50 साल से है। इससे किसान को क्या मिलता है यह खरीफ के मौसम की बड़ी फसल धान के उदाहरण से देख सकते हैं। इस साल सरकार ने धान का एमएसपी पिछले साल के रु.1815 प्रति कुंतल से बढ़ाकर रु.1868 घोषित किया है। कुल बढ़त हुई रु.51 यानी कि 2.9%। यह बढ़त पिछले साल की 3.7% की बढ़त से कम है।

पिछले 5 साल में इतनी कम सालाना बढ़ोतरी कभी नहीं हुई थी। यह बढ़ोतरी इस साल महंगाई की दर 6% से भी आधी है। यानी धान का मूल्य बढ़ा नहीं, कम हुआ। यही बात कमोबेश बाकी फसलों पर भी लागू होती है। खरीफ की जिन 14 फसलों का एमएसपी घोषित हुआ है उनमें से 12 में इस साल की बढ़ोतरी पिछले साल से कम है।

धान के साथ ज्वार, मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन की फसलों के लिए एमएसपी की सालाना बढ़ोतरी पिछले 5 साल में सबसे कम हुई है। किसान की लागत की तुलना में भी सरकार द्वारा घोषित मूल्य असंतोषजनक है। सरकार हर साल गाजे-बाजे के साथ घोषणा करती है कि स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिश के अनुसार किसान को लागत का डेढ़ गुना दाम मिल गया है।

इसमें यह सच दब जाता है कि इस सरकार ने लागत की परिभाषा ही बदल दी है और डेढ़ गुना का दावा आंशिक लागत के आधार पर किया जा रहा है। अगर किसान की संपूर्ण लागत देखी जाए तो इस साल धान की लागत लगभग रु. 1700 प्रति क्विंटल बैठती है। उस हिसाब से सरकारी मूल्य रु. 1868 की बजाय रु. 2550 होना चाहिए था।

इस वास्तविक लागत पर किसान को अधिकांश फसल में मुश्किल से 10% से 20% की ही बचत होती है। और वह भी तब जब उसे बाजार में सरकारी भाव मिले। हकीकत यह है कि देश के आधे से कम राज्यों में सरकारी खरीद होती है, और वह भी सिर्फ गेहूं और धान की ही।
सरकार की दूसरी बड़ी घोषणा यह थी कि किसानों को फसल लोन रियायती ब्याज दर पर मिलेगा। लेकिन इस घोषणा में कुछ भी नया नहीं था। किसान क्रेडिट कार्ड पर फसल लोन की सुविधा लगभग 20 साल से चल रही है। समय पर भुगतान करने पर ब्याज में 3 प्रतिशत अतिरिक्त छूट का प्रावधान भी बहुत पुराना है।

इस साल सरकार ने 31 अगस्त तक भुगतान में देरी की छूट जरूर दे दी, लेकिन इस देरी के दौरान चक्रवर्ती ब्याज में कोई रियायत नहीं मिलेगी। यही हाल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी द्वारा किसानों के लिए की गई बड़ी घोषणाओं का था। किसान सम्मान निधि की हर किस्त को सरकार ऐसे पेश करती है मानो कोई नया तोहफा दिया हो।

किसानों के लिए की गई घोषणाओं की लंबी फेहरिस्त में अधिकांश घोषणाएं वे थीं जिन्हें यही वित्त मंत्री फरवरी के बजट भाषण में घोषित कर चुकी थीं! यानी कि पुरानी शराब, पुरानी बोतल और लेबल भी पुराना, बस उसे एक नए लिफाफे में डालकर थमाया जा रहा था।

अर्थशास्त्रियों का ध्यान भरमाने के लिए वित्त मंत्री ने तीन दूरगामी नीतिगत घोषणाएं भी कर डालीं। आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी के विरुद्ध कानून ढीला होगा, कृषि मंडी के कानून में सुधार होगा और ठेके पर खेती को कानूनी मान्यता मिलेगी।

मजे की बात यह कि इनमें से एक भी सुधार ऐसा नहीं था, जिसकी मांग देश के किसान कर रहे हैं। इन तीनों ही नीतियों का कोरोना और लॉकडाउन के कारण किसान को हो रही परेशानी से दूर-दूर का वास्ता नहीं था।
पिछले सप्ताह वर्ष 2019-20 के जीडीपी के आंकड़े ने फिर याद दिलाया है कि जहां अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्र मंदी का शिकार हुए हैं, वही कृषि ने 5.9% वृद्धि से अर्थव्यवस्था को बचाए रखा है। आज कोरोना का सामना करते हुए अगर देश सर उठा कर खड़ा है तो इसीलिए क्योंकि किसान की मेहनत से देश में पर्याप्त अन्न भंडार उपलब्ध है। अन्नदाता ने तो देश के लिए अपना काम कर दिया लेकिन क्या देश के कर्णधार भी अन्नदाता के लिए अपना काम करेंगे?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)



आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें
योगेंद्र यादव, सेफोलॉजिस्ट और अध्यक्ष, स्वराज इंडिया


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2U6UY7T

No comments:

Post a Comment

What is NHS Medical? A Comprehensive Guide

The National Health Service (NHS) is a cornerstone of the United Kingdom’s healthcare system, providing a wide range of medical services to...